जस्टिस चंद्रचूड़ की ‘सांप्रदायिक मानसिकता’ का पर्दाफ़ाश- प्रशांत भूषण

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि न्यूजलॉन्ड्री के श्रीनिवासन जैन के साथ इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी ‘सांप्रदायिक मानसिकता’ का पर्दाफ़ाश किया है। श्री भूषण ने कहा कि उनका कहना है कि 500 साल पहले मंदिर का विध्वंस (जिसका कोई सबूत नहीं था) अब मस्जिद तोड़ने वालों को ज़मीन देने का एक अच्छा कारण है! कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वेक्षण जारी रहने दिया, जबकि अयोध्या मामले में उनके फ़ैसले में कहा गया था कि उपासना स्थल अधिनियम भविष्य में ऐसे विवादों को ख़त्म कर देगा! निंदनीय!

दरअसल भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ का कहना है कि मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बाबरी मस्जिद को गिराना एक अपराध था। ऐसे प्रमाण नहीं मिले हैं कि बाबरी मस्जिद को मंदिर की जगह बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने यह फैसला सुनाया था, उस बेंच में डीवाई चंद्रचूड़ भी थे, जबकि उस समय चीफ जस्टिस रंजन गोगोई थे, जो अब भाजपा की मदद से सांसद बन चुके हैं। 

सत्य हिंदी डॉट कॉम के अनुसार अयोध्या में राम मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवादों पर अपने विचार साझा करते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले साक्ष्यों पर आधारित थे, न कि केवल विश्वास पर। न्यूजलॉन्ड्री के श्रीनिवासन जैन को दिए विशेष इंटरव्यू में उन्होंने इन ऐतिहासिक फैसलों के पीछे की प्रक्रिया और अपने व्यक्तिगत विश्वासों का जिक्र किया। जिसमें उन्होंने “भगवान से मार्गदर्शन” की बात भी कही। उनके बयानों ने न्यायिक निष्पक्षता और धार्मिक कहानियों के बीच एक जटिल बहस को जन्म दे दिया है।

चंद्रचूड़ ने अयोध्या मामले में 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूरी तरह साक्ष्य-आधारित बताया। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद के निर्माण को “मूल अपवित्रता का कार्य” माना गया, जो हिंदू पक्ष के दावों के अनुरूप है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया था कि पुरातात्विक साक्ष्य मस्जिद के नीचे किसी मंदिर को तोड़े जाने की पुष्टि नहीं करते। फिर भी, चंद्रचूड़ ने 1949 की घटना का बचाव किया, जब बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखी गई थीं, और इसे हिंदू पक्ष के खिलाफ नहीं माना। उनके इस बयान ने सवाल उठाए हैं कि क्या यह नज़रिया साक्ष्यों से अधिक विश्वास पर आधारित था।

चंद्रचूड़ ने अपने व्यक्तिगत विश्वासों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें भगवान से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। हालांकि, उन्होंने इस पर विस्तार से नहीं बताया। इस टिप्पणी ने उनके फैसलों की निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी है, क्योंकि धार्मिक विश्वासों का उल्लेख संवेदनशील मामलों में पक्षपात के आरोपों को बढ़ावा दे सकता है।

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर चंद्रचूड़ ने मस्जिद के सर्वे की अनुमति को उचित ठहराया। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद के तहखाने में हिंदुओं द्वारा सदियों से पूजा की जाती रही है और इस पर विवाद नहीं था। हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने इस दावे का लगातार विरोध किया है। 1991 के पूजा स्थल अधिनियम के बावजूद, जो धार्मिक स्थलों की स्थिति को यथावत रखने की बात कहता है, चंद्रचूड़ ने कहा कि ज्ञानवापी की धार्मिक प्रकृति का सवाल “बंद” नहीं है यानी उसके मंदिर होने का सवाल खुला हुआ है। चंद्रचूड़ के इस बयान ने पूजा अधिनियम के उल्लंघन और न्यायिक तटस्थता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

डॉ रुचिका शर्मा ने बाबरी मस्जिद स्थल खुदाई से जुड़े दो इतिहासकारों जया मेनन और प्रोफेसर सुप्रिया वर्मा के हवाले से कहा कि चंद्रचूड़ का दावा  यह गलत है! अदालत ने बाबरी खुदाई के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किए थे। प्रोफ़ेसर वर्मा और मेनन ने अदालत में 14 शिकायतें दर्ज कराईं, जिनमें कहा गया कि एएसआई ने खुदाई करते समय जानबूझकर ऐसे खंभे बनाए ताकि ऐसा लगे कि नीचे कोई मंदिर था, जबकि असल में नीचे एक 13वीं सदी की मस्जिद मिली। बाबरी का निर्माण एक पुरानी मस्जिद पर हुआ था, मंदिर पर नहीं! डॉ रुचिका शर्मा ने मेनन और वर्मा का एक रिसर्च लेख का लिंक भी एक्स पर दिया है। जया मेनन और प्रोफेसर सुप्रिया वर्मा का वो रिसर्च लेख इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ था।

Leave a Reply